भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को भारतीय रुपये की गिरती कीमत को रोकने के लिए आपातकालीन उपायों का ऐलान किया है। रुपया इस समय अपने अब तक के सबसे निचले स्तर के करीब कारोबार कर रहा है, जिसे बचाने के लिए यह कदम उठाए गए हैं।
इस राहत पैकेज के तहत सार्वजनिक क्षेत्र की तेल मार्केटिंग कंपनियों के लिए एक स्पेशल डॉलर विंडो शुरू की गई है। इसके साथ ही, करेंसी पर सट्टेबाजी के दबाव को कम करने के लिए विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव्स के नियमों को और सख्त कर दिया गया है।
बाजार के आंकड़ों के अनुसार, इस साल अब तक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की कीमत में करीब 7 प्रतिशत की गिरावट आई है। Bloomberg और LiveMint जैसे माध्यमों की रिपोर्ट के मुताबिक, इस गिरावट ने रुपये को एशिया के सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाले प्रमुख करेंसीज में से एक बना दिया है।
शुक्रवार, 9 अक्टूबर को रुपया 96.73 के स्तर पर बंद हुआ। यह स्तर मई 2026 में दर्ज किए गए रिकॉर्ड निचले स्तर के बेहद करीब पहुंच गया है, जिससे चिंता बढ़ गई थी।
विदेशी मुद्रा बाजार के लिए नए कड़े नियम
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया 12 अक्टूबर से एक स्पेशल विंडो संचालित करेगा। यह सुविधा तीन बड़ी कंपनियों की डॉलर की पूरी दैनिक जरूरतों को पूरा करेगी। इन कंपनियों में Indian Oil Corporation, Hindustan Petroleum और Bharat Petroleum शामिल हैं।
RBI प्रेस रिलीज 2026 2027/1306 में पुष्टि की गई है कि ये कंपनियां नामित बैंकों के माध्यम से अपनी डॉलर आवश्यकताओं को पूरा करेंगी। इस बदलाव का मकसद स्पॉट मार्केट से भारी मांग को हटाना है, क्योंकि यही मांग बाजार में अस्थिरता पैदा कर रही थी।
डेरिवेटिव मार्केट के लिए भी नियमों में बदलाव किया गया है। अब अधिकृत डीलरों को रुपये से जुड़े किसी भी रद्द किए गए विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट की दोबारा बुकिंग करने की अनुमति नहीं होगी।
बिना किसी दस्तावेजी प्रमाण के हेजिंग के लिए निर्धारित सीमा को 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दिया गया है। इन सभी विशिष्ट प्रतिबंधों का विवरण RBI सर्कुलर A.P. (DIR Series) No. 26 में दिया गया है।
केंद्रीय बैंक ने ‘फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व’ की शुरुआत भी की है। 2 मिलियन डॉलर से अधिक के डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए बैंकों को RBI के पास नॉमिनल वैल्यू का 20 प्रतिशत कैश रिजर्व रखना होगा।
- यह रिजर्व कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने तक रोजाना बनाए रखना अनिवार्य होगा।
- स्वतंत्र विश्लेषकों का कहना है कि यह नीति चीन में पहले इस्तेमाल किए गए तरीकों से प्रेरित है।
रुपये पर दबाव डालने वाले मुख्य कारण
विदेशी मुद्रा की निरंतर मांग का मुख्य कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें हैं, जो 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। ऊर्जा आयात की यह उच्च लागत भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल रही है।
The Economic Times की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी की वजह से उभरते बाजारों से पूंजी बाहर जा रही है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) की निकासी ने रुपये की गिरावट को और ज्यादा बढ़ा दिया है।
RBI गवर्नर Sanjay Malhotra ने हाल ही में कहा कि रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट जैसे पैमानों पर रुपया अंडरवैल्यूड नजर आ रहा है। उन्होंने पुष्टि की कि बैंक रुपये को उचित स्तर पर लाने के लिए जरूरी कदम उठाएगा।
गवर्नर ने बताया कि 7 अक्टूबर को पॉलिसी रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.5 प्रतिशत कर दिया गया था। Business Standard के दस्तावेजों के अनुसार, स्पॉट और फॉरवर्ड मार्केट में पहले किए गए हस्तक्षेपों की वजह से कुल विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई है।
मीडिया रिपोर्ट्स में उद्धृत ट्रेजरी प्रोफेशनल्स का कहना है कि रुपये को 97 के स्तर से नीचे जाने से रोकने के लिए ये कदम जरूरी थे। हालांकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बुनियादी दबाव अभी भी बना हुआ है।
बाजार के प्रतिभागी अब यह देखेंगे कि नया रिजर्व रेशियो कितना प्रभावी होता है और तेल कंपनियों के लिए यह विंडो कब तक चलेगी। सोमवार, 12 अक्टूबर को बाजार फिर से खुलेंगे और इन बदलावों के असर का पता चलेगा।
निवेशक और कॉर्पोरेट संस्थाएं रुपये के शुरुआती स्तर और नई सुविधा के जरिए डॉलर की मांग की मात्रा पर नजर रखेंगे। केंद्रीय बैंक ने संकेत दिया है कि वैश्विक वित्तीय चुनौतियों के बीच वह बाजार में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखेगा।









